महिदुल इस्लाम अंकन: एक प्रेरणादायक कहानी
महिदुल इस्लाम अंकन एक ऐसा नाम है जो बांग्लादेश में कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। उनकी कहानी संघर्ष, दृढ़ संकल्प और सफलता की कहानी है। अं...
read moreहर साल 3 दिसंबर को पूरी दुनिया में एक बेहद खास दिन मनाया जाता है, जिसे हम world disability day या अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के रूप में जानते हैं। यह दिन केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह एक अवसर है उन लाखों लोगों के संघर्ष, साहस और उपलब्धियों को सलाम करने का, जो शारीरिक या मानसिक चुनौतियों के बावजूद जीवन में आगे बढ़ रहे हैं।
अक्सर हम अपने दैनिक जीवन में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि समाज के उस हिस्से को नजरअंदाज कर देते हैं, जिसे हमारे सहयोग और समझ की सबसे ज्यादा जरूरत है। आज का यह लेख इसी विषय पर गहराई से चर्चा करेगा कि क्यों यह दिन महत्वपूर्ण है, हम एक समावेशी समाज (inclusive society) कैसे बना सकते हैं, और दिव्यांग जनों के अधिकारों के प्रति जागरूकता कैसे फैलाई जा सकती है।
जब हम 'दिव्यांगता' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में व्हीलचेयर या बैसाखी की तस्वीर आती है। लेकिन दिव्यांगता का दायरा इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। इसमें दृष्टिबाधितता, सुनने में अक्षमता, मानसिक स्वास्थ्य स्थितियां और सीखने की अक्षमताएं भी शामिल हैं।
मुझे याद है, कुछ साल पहले मैं एक स्कूल के कार्यक्रम में गया था। वहां एक बच्चा था, राहुल, जो बोल नहीं सकता था। शुरुआत में, दूसरे बच्चे उससे बात करने में हिचकिचाते थे। लेकिन जब शिक्षिका ने सांकेतिक भाषा (Sign Language) का एक छोटा सा खेल शुरू किया, तो माहौल बदल गया। अचानक, राहुल उस खेल का स्टार बन गया। यह घटना मुझे हमेशा याद दिलाती है कि बाधाएं अक्सर व्यक्ति में नहीं, बल्कि हमारे वातावरण और हमारे दृष्टिकोण में होती हैं। world disability day हमें यही सिखाता है कि हमें बाधाओं को हटाना है, लोगों को नहीं।
संयुक्त राष्ट्र ने 1992 में इस दिन को मनाने की घोषणा की थी। इसका मुख्य उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देना है। यह दिन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन के हर पहलू में दिव्यांग लोगों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाने का काम करता है।
हर साल इस दिन की एक विशेष थीम होती है। ये थीम्स हमें बताती हैं कि वर्तमान समय में दुनिया को किस दिशा में सोचने की जरूरत है। चाहे वह "समावेशी विकास" हो या "नेतृत्व और भागीदारी", हर थीम का मकसद दिव्यांग जनों को मुख्यधारा से जोड़ना है।
भले ही हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन दिव्यांग जनों के लिए चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती 'पहुंच' (Accessibility) की है।
आज के दौर में तकनीक एक वरदान साबित हो रही है। स्क्रीन रीडर्स, वॉयस कमांड टूल्स, और विशेष रूप से डिजाइन किए
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