आज की स्कूल असेंबली: मुख्य समाचार और अपडेट
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read moreभारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जो सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि एक युग की पहचान बन जाते हैं। vinod khanna उन्हीं चुनिंदा सितारों में से एक थे। उनकी शख्सियत में एक अजीब सा आकर्षण था—एक तरफ वह खूंखार डाकू का किरदार निभा सकते थे, तो दूसरी तरफ एक सौम्य प्रेमी का। उनकी जिंदगी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी, जिसमें शोहरत की बुलंदियां थीं, आध्यात्म का एकांत था और फिर राजनीति का एक नया अध्याय।
विनोद खन्ना का जन्म 1946 में पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। बहुत कम लोग जानते हैं कि विनोद खन्ना ने अपने करियर की शुरुआत एक नायक के रूप में नहीं, बल्कि एक खलनायक के रूप में की थी। सुनील दत्त की फिल्म 'मन का मीत' (1968) से उन्होंने कदम रखा। उस दौर में, जब हर कोई हीरो बनना चाहता था, खन्ना ने विलेन बनकर रिस्क लिया।
लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस इतनी जबरदस्त थी कि दर्शक उन्हें नफरत करने के बजाय पसंद करने लगे। 'मेरा गांव मेरा देश' में उनका डाकू का किरदार आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। उनकी चाल-ढाल और संवाद अदायगी ने उन्हें उस दौर के सबसे स्टाइलिश विलेन के रूप में स्थापित कर दिया। यह वह समय था जब लोग सिनेमाघरों में हीरो के साथ-साथ vinod khanna को देखने के लिए टिकट खरीदते थे।
विलेन से हीरो बनने का सफर आसान नहीं होता, लेकिन विनोद खन्ना ने इसे बड़ी सहजता से तय किया। 'हम तुम और वो' जैसी फिल्मों से उन्होंने अपनी छवि बदली। 70 का दशक आते-आते वह अमिताभ बच्चन के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी माने जाने लगे। कहा जाता है कि अगर विनोद खन्ना ने बीच में फिल्मों से संन्यास न लिया होता, तो बॉलीवुड का इतिहास कुछ और ही होता।
फिल्म 'अमर अकबर एंथनी', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'हेरा फेरी' और 'परवरिश' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह मल्टी-स्टारर फिल्मों में भी अपनी अलग चमक बिखेरते थे। चाहे सामने धर्मेंद्र हों या अमिताभ, विनोद खन्ना कभी फीके नहीं पड़े। उनकी मुस्कान और गंभीर आवाज का मिश्रण दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।
विनोद खन्ना की जिंदगी का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब वे अपने करियर के शिखर पर थे। 1982 में, जब हर निर्माता उन्हें अपनी फिल्म में साइन करना चाहता था, उन्होंने सब कुछ छोड़कर आध्यात्म की राह चुन ली। वह आचार्य रजनीश (ओशो) के शिष्य बन गए और अमेरिका चले गए।
एक सुपरस्टार का अचानक माली बन जाना और आश्रम में बर्तन धोना, यह किसी को भी हैरान कर सकता था। यह फैसला दिखाता है कि उनके लिए शोहरत और दौलत से बढ़कर मन की शांति थी। हालांकि, पांच साल बाद उन्होंने वापसी की, लेकिन वह दौर अब बदल चुका था। फिर भी, 'इंसाफ' और 'सत्यमेव जयते' जैसी फिल्मों से उन्होंने साबित किया कि शेर बूढ़ा हो सकता है, लेकिन शिकार करना नहीं भूलता।
फिल्मी पर्दे के बाद विनोद खन्ना ने राजनीति के मंच पर भी अपनी छाप छोड़ी। वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुए और गुरदासपुर से सांसद चुने गए। एक अभिनेता के तौर पर तो
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