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read moreभारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय की धूल में धुंधले नहीं होते, बल्कि और अधिक चमकते हैं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक ऐसा ही नाम है। जब हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और गणतंत्र के निर्माण की बात करते हैं, तो उनकी छवि एक ऐसे वटवृक्ष की तरह उभरती है जिसकी छांव में भारतीय लोकतंत्र ने अपनी जड़ें जमाईं। वे न केवल स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति थे, बल्कि सादगी, विद्वता और देशभक्ति की एक जीती-जागती मिसाल भी थे।
आज के दौर में जब राजनीति अक्सर सत्ता के संघर्ष का रूप ले लेती है, डॉ. प्रसाद का जीवन हमें याद दिलाता है कि सेवाभाव क्या होता है। बिहार के एक छोटे से गांव जीरादेई से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक का उनका सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, लेकिन इसमें ग्लैमर नहीं, बल्कि कड़ा संघर्ष और अटूट निष्ठा थी।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। बचपन से ही वे एक मेधावी छात्र थे। कहा जाता है कि एक बार उनकी उत्तर पुस्तिका देखकर परीक्षक ने टिप्पणी की थी, "परीक्षार्थी परीक्षक से बेहतर है" (The examinee is better than the examiner)। यह केवल एक किस्सा नहीं, बल्कि उनकी बौद्धिक क्षमता का प्रमाण था।
उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की और कानून में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वकालत के पेशे में उनका भविष्य उज्ज्वल था, वे बहुत पैसा कमा सकते थे, ऐशो-आराम की जिंदगी जी सकते थे। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वे गांधीजी के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि अपनी चलती हुई वकालत छोड़कर देश सेवा में कूद पड़े।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में डॉ. प्रसाद की भूमिका को अक्सर कम करके आंका जाता है, लेकिन वे कांग्रेस के उन स्तंभों में से थे जिन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया। चाहे वह नमक सत्याग्रह हो या भारत छोड़ो आंदोलन, वे हर बार जेल गए और यातनाएं सहीं।
1934 में जब बिहार में भीषण भूकंप आया, तब डॉ. प्रसाद जेल में थे। रिहा होते ही वे राहत कार्यों में जुट गए। उन्होंने जिस तरह से धन जुटाया और पीड़ितों की मदद की, उसने उन्हें जनता का सच्चा नायक बना दिया। यह घटना दिखाती है कि उनके लिए राजनीति केवल भाषण देना नहीं, बल्कि लोगों के आंसू पोंछना था। उनके नेतृत्व कौशल को देखते हुए उन्हें कई बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष भी चुना गया।
भारत की आजादी के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी देश का संविधान बनाना। संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जिस धैर्य और कुशलता से काम किया, वह अतुलनीय है। विभिन्न विचारधाराओं, मतभेदों और तर्कों के बीच सामंजस्य बिठाना कोई आसान काम नहीं था। उन्होंने सुनिश्चित किया कि हर आवाज सुनी जाए और संविधान भारत की आत्मा को प्रतिबिंबित करे।
26 जनवरी 1950 को जब भारत गणतंत्र बना, तो डॉ. प्रसाद को देश का पहला राष्ट्रपति चुना गया। यह पद उनके लिए कोई 'ताज' नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। उन्होंने राष्ट्रपति भवन की शान-शौकत को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे अपनी पत्नी के साथ वहां भी उसी सादगी से रहे, जैसे वे अपने गांव में रहते थे।
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