पाऊ कुबर्सी: बार्सिलोना का नया सितारा?
बार्सिलोना, फुटबॉल की दुनिया का एक ऐसा नाम जो हमेशा से ही युवा प्रतिभाओं को तराशने और उन्हें विश्व मंच पर लाने के लिए जाना जाता रहा है। लियोनेल मेसी, ...
read moreमिल्खा सिंह, जिन्हें 'फ्लाइंग सिख' के नाम से भी जाना जाता है, सिर्फ एक धावक नहीं थे; वह एक किंवदंती थे, एक प्रेरणा थे, और एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा और अटूट दृढ़ संकल्प से भारत को विश्व एथलेटिक्स के मानचित्र पर ला खड़ा किया। उनकी कहानी विभाजन की त्रासदी से उठकर राष्ट्रीय गौरव बनने तक की एक अविश्वसनीय यात्रा है। मिल्खा सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि दृढ़ संकल्प, कड़ी मेहनत और कभी हार न मानने वाले हौसले से किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है।
मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित भारत के गोविंदपुरा (अब पाकिस्तान में) में एक सिख परिवार में हुआ था। 1947 में भारत के विभाजन के दौरान, उन्होंने अपने माता-पिता और परिवार के सदस्यों को खो दिया, जिससे उनके जीवन में गहरा आघात लगा। अनाथ होने के बाद, वह शरणार्थी शिविरों में रहे और जीवन यापन के लिए संघर्ष करते रहे। यह दुखद अनुभव उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने उन्हें कुछ बड़ा करने की प्रेरणा दी। सेना में शामिल होना उनके जीवन को बदलने वाला साबित हुआ।
मिल्खा सिंह ने 1951 में भारतीय सेना में भर्ती होकर अपने जीवन को एक नई दिशा दी। सेना में, उन्होंने एथलेटिक्स में भाग लेना शुरू किया और जल्द ही अपनी असाधारण गति और सहनशक्ति का प्रदर्शन किया। उनके कोच हवलदार गुरुदेव सिंह ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रशिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मिल्खा सिंह ने कड़ी मेहनत और लगन से प्रशिक्षण लिया, और जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उनकी ट्रेनिंग इतनी कठिन होती थी कि कई बार उन्हें लगता था कि वो अब और नहीं दौड़ पाएंगे, लेकिन अपने कोच की प्रेरणा और अपने अंदर की आग के चलते वो कभी रुके नहीं।
1956 के मेलबर्न ओलंपिक में मिल्खा सिंह को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला। हालांकि, वह पदक जीतने में असफल रहे, लेकिन उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धावकों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का अनुभव प्राप्त किया। इस अनुभव ने उन्हें और अधिक मेहनत करने और बेहतर बनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने 1958 के एशियाई खेलों में 200 मीटर और 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया। इसी वर्ष, उन्होंने कार्डिफ़ में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता, जो भारत के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। मिल्खा सिंह ने अपनी अद्भुत प्रदर्शन से पूरी दुनिया को चकित कर दिया।
1960 के रोम ओलंपिक मिल्खा सिंह के करियर का सबसे यादगार पल था, हालांकि यह एक दुखद घटना के रूप में भी याद किया जाता है। 400 मीटर दौड़ में, मिल्खा सिंह ने शानदार शुरुआत की, लेकिन एक गलती के कारण वह अपनी लय खो बैठे और चौथे स्थान पर रहे। पदक जीतने से चूकने के बावजूद, उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया, जो कई वर्षों तक कायम रहा। यह हार उनके लिए एक सबक थी, जिसने उन्हें और अधिक मजबूत बनाया। आज भी, रोम ओलंपिक की वो दौड़ भारतीय खेल इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।
एथलेटिक्स से संन्यास लेने के बाद, मिल्खा सिंह ने खेल प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पंजाब सरकार में खेल निदेशक के रूप में कार्य किया और युवाओं को खेलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने 'मिल्खा सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट' की स्थापना की, जो गरीब और जरूरतमंद खिलाड़ियों को सहायता प्रदान करता है। मिल्खा सिंह की आत्मकथा "द रेस ऑफ माई लाइफ" युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
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