मातेओ सिल्वेटी: एक उभरता हुआ सितारा, जानिए सब कुछ
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read moreगोविंदा, नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। 90 के दशक में, उन्होंने अपनी अनोखी कॉमिक टाइमिंग और डांसिंग स्टाइल से पूरे देश को दीवाना बना दिया था। उनकी फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, बल्कि एक त्यौहार की तरह थीं, जिनमें हँसी, रोमांस, और ढेर सारा ड्रामा होता था। आज भी, उनकी फिल्मों के गाने शादियों और पार्टियों में खूब बजते हैं, और लोग उनकी एक्टिंग के दीवाने हैं। गोविंदा सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक इमोशन हैं, एक एहसास हैं जो हमें हमारी पुरानी यादों में ले जाते हैं।
गोविंदा का जन्म 21 दिसंबर 1963 को मुंबई में हुआ था। उनका परिवार फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ था, लेकिन उन्हें शुरुआती दौर में काफी संघर्ष करना पड़ा। उनके पिता, अरुण कुमार आहूजा, एक अभिनेता थे, और उनकी माँ, निर्मला देवी, एक गायिका थीं। गोविंदा ने कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल की, लेकिन उनका मन हमेशा एक्टिंग में ही लगा रहता था। उन्होंने कई ऑडिशन दिए, लेकिन उन्हें शुरुआती सफलता नहीं मिली। एक समय तो ऐसा भी आया था जब उन्होंने एक्टिंग छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन उनके परिवार और दोस्तों ने उन्हें हौसला दिया और उन्हें कोशिश करते रहने के लिए कहा। आखिरकार, उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें 1986 में फिल्म 'इल्जाम' में मुख्य भूमिका मिली।
'इल्जाम' फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही और गोविंदा रातों-रात स्टार बन गए। उनकी एक्टिंग, डांसिंग और कॉमिक टाइमिंग को लोगों ने खूब पसंद किया। इस फिल्म के बाद, उन्हें कई फिल्मों के ऑफर मिलने लगे और उन्होंने एक के बाद एक कई हिट फिल्में दीं। 'स्वर्ग', 'हत्या', 'जीते हैं शान से', और 'मुजरिम' जैसी फिल्मों ने उन्हें एक एक्शन हीरो के रूप में स्थापित किया, लेकिन उनकी असली पहचान उनकी कॉमेडी फिल्मों से बनी।
गोविंदा की कॉमेडी का अंदाज सबसे अलग था। वे अपनी फिल्मों में बिना किसी तैयारी के, सिर्फ अपने अंदाज से लोगों को हंसाते थे। उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की थी और वे हर तरह के किरदार को बखूबी निभाते थे। 'आँखे', 'राजा बाबू', 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'दीवाना मस्ताना', 'बड़े मियां छोटे मियां', और 'हसीना मान जाएगी' जैसी फिल्मों ने उन्हें कॉमेडी का बादशाह बना दिया। इन फिल्मों में उन्होंने अपनी एक्टिंग से लोगों को पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर कर दिया। मुझे याद है, जब मैं छोटा था, तो मैं और मेरे दोस्त गोविंदा की फिल्में देखने के लिए कितने उत्साहित रहते थे। उनकी फिल्में हमें सारी चिंताएं भुलाकर सिर्फ हंसने का मौका देती थीं। गोविंदा की यही खासियत थी कि वे अपनी फिल्मों से लोगों को खुशी देते थे।
गोविंदा सिर्फ एक अच्छे अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन डांसर भी थे। उनके डांस में एक अलग तरह का स्वैग था, जो लोगों को खूब पसंद आता था। उनके ठुमकों में एक जादू था, जो लोगों को थिरकने पर मजबूर कर देता था। 'मैं से मीना से ना साकी से', 'यूपी वाला ठुमका लगाऊं', 'किसी डिस्को में जाएं', और 'व्हाट इज मोबाइल नंबर' जैसे गाने आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं। गोविंदा ने अपने डांस से बॉलीवुड में एक नया ट्रेंड शुरू किया, जिसे आज भी कई डांसर फॉलो करते हैं।
अपने फिल्मी करियर के दौरान, गोविंदा ने राजनीति में भी कदम रखा। उन्होंने 2004 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर मुंबई से लोकसभा चुनाव जीता। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई विकास कार्य किए, लेकिन वे राजनीति में ज्यादा समय तक नहीं टिक पाए। 2009 में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया और फिर से फिल्मों में सक्रिय हो गए
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