छत्तीसगढ़: पर्यटन, संस्कृति और इतिहास का संगम
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read moreभारतीय राजनीति और इतिहास के गलियारों में अक्सर ऐसे मुद्दे उठते हैं जो दशकों पुराने घावों को कुरेद देते हैं और नई बहसों को जन्म देते हैं। इनमें से सबसे ज्वलंत और बार-बार उभरने वाला मुद्दा शशि थरूर वीर सावरकर के बीच का वैचारिक द्वंद्व है। जब भी विनायक दामोदर सावरकर की बात होती है, कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध लेखक शशि थरूर की टिप्पणियाँ अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। यह केवल दो व्यक्तियों की बात नहीं है, बल्कि यह भारत की स्वतंत्रता संग्राम के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों की टकराने की कहानी है।
इतिहास को देखने का सबका अपना नजरिया होता है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय नायकों की आती है, तो भावनाएं उफान पर होती हैं। शशि थरूर, जो अपनी वाकपटुता और ऐतिहासिक ज्ञान के लिए जाने जाते हैं, ने कई मौकों पर सावरकर की विचारधारा और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, सावरकर के अनुयायी उन्हें एक महान क्रांतिकारी और हिंदुत्व का प्रणेता मानते हैं।
थरूर का तर्क अक्सर इस बात पर केंद्रित होता है कि सावरकर ने जेल से छूटने के लिए अंग्रेजों को दया याचिकाएं लिखी थीं। वे इसे गांधीवादी अहिंसा और नेहरूवादी समाजवाद के विपरीत एक कमजोरी के रूप में पेश करते हैं। वहीं, सावरकर के समर्थकों का कहना है कि यह एक रणनीतिक कदम था ताकि वे जेल से बाहर आकर देश के लिए काम कर सकें, न कि अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण। यह द्वंद्व आज भी भारतीय राजनीति में शशि थरूर वीर सावरकर के इर्द-गिर्द घूमने वाली बहसों का केंद्र बिंदु है।
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए हमें भावनाओं से परे जाकर तथ्यों को देखना होगा। जब शशि थरूर सावरकर की आलोचना करते हैं, तो वे अक्सर अंडमान की सेलुलर जेल (काला पानी) में बिताए गए सावरकर के समय का जिक्र करते हैं। उनका कहना है कि एक तरफ भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया, और दूसरी तरफ सावरकर थे जिन्होंने रिहाई के लिए अंग्रेजों को पत्र लिखे।
लेकिन क्या इतिहास इतना ही श्वेत-श्याम (Black and White) होता है? शायद नहीं। सावरकर के जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेल में असहनीय यातनाओं के बीच बीता। उनकी विचारधारा थी कि "जीवित रहकर ही राष्ट्र की सेवा की जा सकती है।" थरूर की आलोचना को कई इतिहासकार एकतरफा मानते हैं, क्योंकि राजनीति में संदर्भ (Context) बहुत महत्वपूर्ण होता है। एक लेखक के तौर पर थरूर को यह समझना चाहिए कि ऐतिहासिक दस्तावेजों का मूल्यांकन उस समय की परिस्थितियों के अनुसार होना चाहिए।
आज के दौर में, जब राष्ट्रवाद की परिभाषा पर बहस छिड़ी हुई है, शशि थरूर वीर सावरकर का मुद्दा महज एक ऐतिहासिक चर्चा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक राजनीतिक हथियार बन चुका है। सत्ताधारी दल सावरकर को एक आदर्श के रूप में पेश करता है, जबकि विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस, उनकी विचारधारा का विरोध करती है।
थरूर ने अपनी किताबों और भाषणों में अक्सर हिंदुत्व की विचारधारा को सावरकर की देन बताया है और इसे भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए खतरा माना है। उनका मानना है कि सावरकर का 'दो राष्ट्र सिद्धांत' (Two Nation Theory) भारत की विविधता के खिलाफ था। हालांकि, यह भी एक तथ्य है कि सावरकर ने जाति प्रथा के खिलाफ भी कड़ा संघर्ष किया था, जिसे अक्सर उनके आलो
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