Unveiling the Enigmatic Abhijit Majumdar
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read moreजब हम मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी घटनाओं के बारे में सोचते हैं, तो कुछ तारीखें हमारे दिमाग में हमेशा के लिए छप जाती हैं। 26 अप्रैल, 1986, एक ऐसी ही तारीख है। यह वह दिन था जब सोवियत संघ (अब यूक्रेन) के chernobyl न्यूक्लियर पावर प्लांट में एक भयानक विस्फोट हुआ था। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी; यह एक ऐसी त्रासदी थी जिसने न केवल आस-पास के शहरों को बल्कि पूरी दुनिया को परमाणु ऊर्जा के खतरों के प्रति सचेत कर दिया।
आज, दशकों बाद भी, उस जगह का सन्नाटा बहुत कुछ कहता है। वहां की खाली इमारतें, जंग लगे झूले और वीरान सड़कें उस रात की गवाही देती हैं जब समय हमेशा के लिए थम गया था। आइए, इस घटना की गहराई में उतरते हैं और समझते हैं कि वास्तव में क्या हुआ था और इसका हम पर क्या असर पड़ा।
कल्पना कीजिए कि आप सो रहे हैं, और अचानक शहर के सायरन बजने लगते हैं। प्रिपयात (Pripyat) शहर के निवासियों के लिए वह रात कुछ ऐसी ही थी। यह शहर विशेष रूप से प्लांट के कर्मचारियों के लिए बनाया गया था। सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन रिएक्टर नंबर 4 के कंट्रोल रूम में कुछ बहुत ही खतरनाक घट रहा था।
इंजीनियर एक सुरक्षा परीक्षण (safety test) कर रहे थे। विडंबना देखिए, जिस टेस्ट का मकसद सुरक्षा को परखना था, वही विनाश का कारण बन गया। मानवीय गलतियों और रिएक्टर के डिजाइन में कमियों के एक घातक मिश्रण के कारण, रिएक्टर बेकाबू हो गया। भाप का दबाव इतना बढ़ गया कि उसने रिएक्टर की भारी-भरकम छत को उड़ा दिया। इसके बाद जो हुआ, वह नरक जैसा था—रेडिएशन का एक विशाल बादल हवा में फैल गया, जो हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से कई गुना अधिक शक्तिशाली था।
अक्सर जब हम chernobyl की बात करते हैं, तो हम आंकड़ों में खो जाते हैं। कितने मरे? कितना नुकसान हुआ? लेकिन असली कहानी उन लोगों की है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दुनिया को बचाया। उन्हें 'लिक्विडेटर्स' (Liquidators) कहा गया।
ये अग्निशमन कर्मी, सैनिक और खनिक थे जिन्हें बिना किसी उचित सुरक्षा उपकरण के जलते हुए रिएक्टर की आग बुझाने और मलबे को साफ करने के लिए भेजा गया था। सोचिए, उन फायरफाइटर्स के बारे में जो छत पर चढ़े थे, उन्हें लगा था कि यह एक साधारण आग है। उन्हें नहीं पता था कि वे अदृश्य मौत के संपर्क में आ रहे हैं। उनके जूते पिघल रहे थे, उनके शरीर पर छाले पड़ रहे थे, लेकिन वे डटे रहे। अगर उन्होंने अपनी जान न दी होती, तो शायद आधा यूरोप रहने लायक नहीं बचता। यह मानवीय साहस का एक ऐसा उदाहरण है जो रोंगटे खड़े कर देता है।
दुर्घटना के अगले दिन, अधिकारियों ने प्रिपयात को खाली कराने का आदेश दिया। लोगों से कहा गया कि वे केवल तीन दिन के लिए जा रहे हैं, इसलिए वे अपना सारा सामान, पालतू जानवर और यादें वहीं छोड़ गए। वे कभी वापस नहीं लौटे।
आज, प्रिपयात
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