ECGC: एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन पर संपूर्ण गाइड
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read moreभारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ अध्याय ऐसे होते हैं जो सदियों तक जनमानस के दिलों और दिमाग पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। babri masjid का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है। यह केवल ईंट और गारे से बनी एक इमारत की कहानी नहीं है, बल्कि यह आस्था, राजनीति, कानून और सामाजिक ताने-बाने की एक जटिल यात्रा है। अयोध्या में सरयू नदी के किनारे घटी घटनाओं ने न केवल भारत की राजनीति को बदला, बल्कि देश की सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डाला।
जब हम इतिहास की गहराइयों में उतरते हैं, तो हमें पता चलता है कि 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसे ही बाद में babri masjid के नाम से जाना गया। वास्तुकला की दृष्टि से यह उस दौर की एक सामान्य संरचना थी, लेकिन इसका स्थान इसे विशेष बनाता था। स्थानीय मान्यताओं और बाद में उभरे दावों के अनुसार, यह स्थान भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता रहा है।
इतिहासकार अक्सर इस बात पर बहस करते हैं कि क्या वहां पहले से कोई मंदिर मौजूद था या नहीं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्टों ने बाद में इस बहस को और हवा दी, जिसमें मस्जिद के नीचे एक विशाल संरचना के प्रमाण मिलने की बात कही गई थी। यह ऐतिहासिक असमंजस ही वह बीज था जिसने आगे चलकर एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले लिया।
यह विवाद रातों-रात पैदा नहीं हुआ। 19वीं सदी के मध्य में ही पहली बार इस स्थल को लेकर सांप्रदायिक तनाव की खबरें सामने आने लगी थीं। अंग्रेजी शासनकाल में ही बाड़ लगाकर दोनों समुदायों के लिए अलग-अलग पूजा और नमाज की जगह तय कर दी गई थी। लेकिन असली कानूनी लड़ाई आजादी के बाद शुरू हुई।
1949 की एक रात जब मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे मूर्तियां प्रकट हुईं, तो प्रशासन ने विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए ताला लगा दिया। इसके बाद अदालतों में मुकदमों का एक लंबा दौर शुरू हुआ। यह दौर इतना लंबा चला कि कई पीढ़ियां इस केस की सुनवाई का इंतजार करते-करते गुजर गईं। एक तरफ निर्मोही अखाड़ा था, तो दूसरी तरफ सुन्नी वक्फ बोर्ड और राम लला विराजमान। हर पक्ष के पास अपने तर्क थे, अपने दस्तावेज थे और अपनी अटूट आस्था थी।
भारतीय इतिहास में 6 दिसंबर 1992 की तारीख को कभी भुलाया नहीं जा सकता। कारसेवकों की एक बड़ी भीड़ ने अयोध्या में babri masjid के ढांचे को ढहा दिया। यह घटना केवल एक इमारत का गिरना नहीं थी, बल्कि इसने पूरे देश में सांप्रदायिक दंगों की आग भड़का दी। मुंबई से लेकर सूरत तक, देश का एक बड़ा हिस्सा हिंसा की चपेट में आ गया।
इस घटना ने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद की परिभाषाओं पर नई बहस छिड़ गई। जांच आयोग बने, रिपोर्टें आईं, लेकिन जो सामाजिक दरार उस दिन पैदा हुई, उसे भरने में दशकों लग गए। आज भी जब लोग उस दिन को याद करते हैं, तो सिहर उठते हैं। यह घटना हमें याद दिलाती है कि कैसे अनियंत्रित भावनाएं कानून और व्यवस्था को चुनौती दे सकती हैं।
दशकों तक चली कानूनी रस्साकशी के बाद, 2019 में भारत के सर्वोच्च
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