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read moreभारत के सामाजिक इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज की नींव को मजबूत करते रहे हैं। ऐसे ही एक कर्मयोगी का नाम है बाबा आढाव। पुणे की गलियों से लेकर राष्ट्रीय मंचों तक, उन्होंने हमेशा उन लोगों की आवाज उठाई है जिन्हें अक्सर समाज अनदेखा कर देता है। एक डॉक्टर होने के बावजूद, उन्होंने स्टेथोस्कोप की जगह सामाजिक सरोकार को चुना और अपना पूरा जीवन वंचितों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
डॉ. बाबा आढाव का जन्म 1 जून 1930 को पुणे में हुआ था। उनका पूरा नाम रोहिदास (बाबा) आढाव है। बचपन से ही उन्होंने समाज में व्याप्त असमानता को बहुत करीब से देखा था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की हलचल और महात्मा गांधी व ज्योतिबा फुले के विचारों ने उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला। एक युवा छात्र के रूप में, वे राष्ट्र सेवा दल से जुड़े, जहाँ उन्हें अनुशासन और सेवा का पाठ पढ़ने को मिला।
अक्सर हम देखते हैं कि लोग अपना करियर बनाने की दौड़ में सामाजिक जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ देते हैं, लेकिन बाबा आढाव ने चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी अपनी प्रैक्टिस को पैसा कमाने का जरिया नहीं बनाया। उन्होंने इसे समाज सेवा का माध्यम समझा। पुणे के नाना पेठ इलाके में उन्होंने अपनी डिस्पेंसरी शुरू की, जो जल्द ही गरीब मरीजों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का अड्डा बन गई।
बाबा आढाव के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 'हमाल पंचायत' की स्थापना है। 1950 और 60 के दशक में, पुणे के बाजारों में काम करने वाले हमाल (बोझा ढोने वाले मजदूर) बेहद दयनीय स्थिति में थे। न काम के घंटे तय थे, न ही कोई सामाजिक सुरक्षा। उन्हें इंसान से कम समझा जाता था।
एक बार की बात है, बाबा ने देखा कि एक हमाल भारी बोझा उठाते हुए गिर पड़ा, लेकिन किसी ने उसकी मदद करने के बजाय उसे डांटना शुरू कर दिया। इस घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उन्होंने महसूस किया कि इन मजदूरों को संगठित होना होगा। इसी विचार ने 'हमाल पंचायत' को जन्म दिया। यह केवल एक यूनियन नहीं थी, बल्कि यह मजदूरों के आत्मसम्मान की लड़ाई थी।
आज अगर हम baba adhav के संघर्षों को देखें, तो पाएंगे कि उन्होंने केवल मजदूरी बढ़ाने की बात नहीं की। उन्होंने मजदूरों के लिए 'माथाडी एक्ट' जैसा कानून बनवाया, जिससे उन्हें कानूनी सुरक्षा मिली। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक जीत थी, जिसने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को एक नई पहचान दी।
महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में भी जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं। 1970 के दशक में बाबा आढाव ने 'एक गाव, एक पाणवठा' (एक गाँव, एक पानी का स्रोत) आंदोलन शुरू किया। उस समय दलितों को सार्वजनिक कुओं से पानी भरने की अनुमति नहीं थी। यह केवल पानी का सवाल नहीं था, यह मानवीय गरिमा का प्रश्न था।
बाबा आढाव और उनके साथियों ने गाँव-गाँव जाकर सत्याग्रह किया। उन्हें कई बार धमकियां मिलीं, विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन वे डिगे नहीं। मुझे याद है, एक पुराने कार्यकर्ता ने बताया था कि कैसे एक गाँव में सवर्णों ने कुएं में गंदगी डाल दी थी ताकि दलित पानी न पी सकें। बाबा आढाव ने खुद उस कुएं को साफ किया और सबसे पहले पानी पीकर उस छुआछूत की दीवार को तोड़ा। यह आंदोलन सामाजिक समरसता की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
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