Casio Edifice EFK 100: कीमत और खूबियाँ
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read moreभारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर की बात हो और उसमें asha parekh का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। 60 और 70 के दशक में अपनी अदाकारी, नृत्य और बेबाक अंदाज से दर्शकों के दिलों पर राज करने वालीं आशा पारेख न सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेत्री थीं, बल्कि उन्होंने भारतीय फिल्म उद्योग में महिलाओं के लिए एक नई मिसाल भी कायम की। आज हम उनके इसी शानदार सफर पर एक नज़र डालेंगे, जो न केवल प्रेरणादायक है बल्कि ग्लैमर की दुनिया के कई अनछुए पहलुओं को भी उजागर करता है।
अक्सर हम सितारों को पर्दे पर चमकते हुए देखते हैं और सोचते हैं कि उनकी जिंदगी कितनी आसान रही होगी। लेकिन आशा जी की कहानी कुछ अलग थी। उनका जन्म एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि उनकी मां मुस्लिम थीं और पिता हिंदू, जिससे उन्हें घर में ही एक बहुत ही सेक्युलर और खुला माहौल मिला। बचपन से ही उनका रुझान नृत्य की ओर था। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही शास्त्रीय नृत्य सीखना शुरू कर दिया था।
क्या आप जानते हैं कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक बाल कलाकार के रूप में की थी? फिल्म 'मां' (1952) में उन्हें पहली बार देखा गया। लेकिन असली मोड़ तब आया जब मशहूर फिल्म निर्माता बिमल रॉय ने उन्हें देखा। हालांकि, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बिमल रॉय ने उन्हें अपनी फिल्म के लिए रिजेक्ट कर दिया था, यह कहकर कि उनमें 'स्टार मटेरियल' नहीं है। सोचिए, जिस अभिनेत्री को बाद में 'जुबली गर्ल' कहा गया, उसे कभी रिजेक्ट कर दिया गया था। यह हमें सिखाता है कि असफलता अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत होती है।
रिजेक्शन के कुछ ही समय बाद, निर्माता नासिर हुसैन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म 'दिल दे के देखो' (1959) में शम्मी कपूर के साथ लॉन्च किया। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट रही और रातों-रात asha parekh एक स्टार बन गईं। शम्मी कपूर के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब सराहा।
इसके बाद तो जैसे हिट फिल्मों की झड़ी लग गई। 'जब प्यार किसी से होता है', 'तीसरी मंजिल', 'बहारों के सपने', 'प्यार का मौसम' और 'कटी पतंग' जैसी फिल्मों ने उन्हें इंडस्ट्री की सबसे भरोसेमंद अभिनेत्री बना दिया। उनका नाम ही फिल्म के हिट होने की गारंटी माना जाने लगा था। यही वजह है कि उन्हें 'जुबली गर्ल' का खिताब मिला, क्योंकि उनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में सिल्वर और गोल्डन जुबली मनाती थीं।
आशा जी की अभिनय शैली में एक खास तरह का चुलबुलापन और मासूमियत थी, जो दर्शकों को अपना बना लेती थी। लेकिन उन्होंने सिर्फ रोमांटिक भूमिकाएं ही नहीं कीं। फिल्म 'दो बदन', 'चिराग' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' में उन्होंने अपनी गंभीर अभिनय क्षमता का भी लोहा मनवाया। 'कटी पतंग' के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला, जो उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
अभिनय के अलावा, उनका फैशन सेंस भी कमाल का था। उनकी साड़ियां, उनका हेयरस्टाइल (खासकर वो ऊंचा जूड़ा), और उनका आईलाइनर लगाने का तरीका उस दौर की हर लड़की कॉपी करना चाहती थी। आज भी जब हम रेट्रो लुक की बात करते हैं, तो आशा पारेख का स्टाइल सबसे पहले जेहन में आता है।
फिल्मी दुनिया की चमक-दमक के पीछे अक्सर एक अकेलापन छिपा होता है। आशा पारेख ने अपनी आत्मकथा 'द हिट गर्ल' में अपने
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