शुभमन गिल: क्रिकेट के नए सितारे
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read moreभारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ पर्दे पर नहीं चलतीं, बल्कि लोगों के दिलों में बस जाती हैं। 'नदिया के पार' एक ऐसा ही नाम है, जो सुनते ही 80 के दशक की वो सौंधी खुशबू, गांव की पगडंडियां और निश्छल प्रेम याद आ जाता है। आज के दौर में जब हम वीएफएक्स और भारी-भरकम बजट वाली फिल्मों की चकाचौंध में खोए हैं, नदिया के पार जैसी सादगी भरी फिल्म एक ठंडी हवा के झोंके जैसी लगती है।
अगर आपने कभी अपने दादा-दादी या माता-पिता से उनकी पसंदीदा फिल्मों के बारे में पूछा होगा, तो यह नाम जरूर आया होगा। 1982 में रिलीज़ हुई यह फिल्म राजश्री प्रोडक्शंस की एक बेहतरीन पेशकश थी। इसकी कहानी केशव प्रसाद मिश्र के हिंदी उपन्यास 'कोहबर की शर्त' पर आधारित थी। लेकिन फिल्म की असली ताकत इसकी कहानी से ज्यादा इसकी प्रस्तुति में थी।
फिल्म में चंदन (सचिन पिलगांवकर) और गुंजा (साधना सिंह) की जोड़ी ने जो जादू बिखेरा, वह आज भी बेमिसाल है। गुंजा का चुलबुलापन और चंदन का संकोच, दोनों मिलकर एक ऐसा रसायन पैदा करते थे जो दर्शकों को अपना सा लगता था। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि प्रेम के लिए किसी महल या विदेशी लोकेशंस की जरूरत नहीं होती; जौनपुर के एक छोटे से गांव और सरयू नदी के किनारे भी अमर प्रेम कहानियां लिखी जा सकती हैं।
इस फिल्म की चर्चा इसके संगीत के बिना अधूरी है। रविंद्र जैन का संगीत और उनके लिखे गीत आज भी शादियों और पारिवारिक समारोहों की जान हैं। "कौन दिशा में लेके चला रे बटुहिया" गीत सुनते ही ऐसा लगता है जैसे हम खुद उस बैलगाड़ी में बैठे हैं, हिचकोले खा रहे हैं और गुंजा की तरह दुनिया को नई नजरों से देख रहे हैं।
गीतों में जो लोकधुनों का इस्तेमाल किया गया था, वह अद्भुत था। "जोगी जी धीरे धीरे" होली का एक ऐसा गीत बन गया है जिसके बिना उत्तर भारत में होली का रंग फीका लगता है। यह संगीत की वह ताकत थी जिसने नदिया के पार को सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर बना दिया। आज के शोर-शराबे वाले संगीत के बीच, इन गीतों की मेलोडी मन को सुकून देती है।
आजकल की फिल्मों में अक्सर परिवार को टूटते या बिखरते दिखाया जाता है, या फिर मॉडर्न ख्यालात के नाम पर रिश्तों की अहमियत कम कर दी जाती है। लेकिन इस फिल्म ने संयुक्त परिवार की ताकत को बहुत खूबसूरती से दिखाया। बड़े भाई का सम्मान, भाभी का देवर के प्रति वात्सल्य और पूरे परिवार का एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहना—ये सब बातें हमें सिखाती हैं कि भारतीय समाज की नींव क्या है।
फिल्म का क्लाइमेक्स, जहां त्याग और समझदारी का परिचय दिया जाता है, दर्शकों की आंखों में आंसू ला देता है। यह फिल्म हमें सिखाती है कि कई बार अपनी खुशी से ज्यादा जरूरी दूसरों की खुशी होती है, और यही सच्चा प्रेम है।
कई लोग सवाल करते हैं कि क्या आज की डिजिटल पीढ़ी इस तरह की धीमी और ग्रामीण परिवेश की फिल्म को पसंद करेगी? जवाब है, हां। क्योंकि भावनाएं कभी पुरानी नहीं होतीं। आज जब हम ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर 'पंचायत' जैसी वेब सीरीज को हिट होते देखते हैं, तो यह साबित होता है कि दर्शक आज भी मिट्टी से जुड़ी कहानियां देखना चाहते हैं।
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