मेहराज मलिक: जीवन, करियर और प्रेरणादायक बातें
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read moreहिंदू धर्म में त्रिदेवों – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – का विशेष स्थान है, लेकिन जब इन तीनों शक्तियों का एक ही स्वरूप में मिलन होता है, तो वह रूप भगवान दत्तात्रेय का कहलाता है। दत्त जयंती, जिसे दत्तात्रेय जयंती के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत पवित्र पर्व है जो भगवान दत्तात्रेय के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2025 में आने वाली दत्त जयंती 2025 भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है। यह न केवल भक्ति का पर्व है, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा का एक अनूठा उत्सव भी है।
मैंने बचपन में अपने दादाजी से सुना था कि भगवान दत्तात्रेय को 'आदि गुरु' माना जाता है। उन्होंने प्रकृति के 24 तत्वों को अपना गुरु बनाया था, जिससे हमें यह सीख मिलती है कि ज्ञान कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है। आइए, इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि 2025 में दत्त जयंती कब है, इसका क्या महत्व है और इसकी पूजा विधि क्या है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, दत्त जयंती हर साल मार्गशीर्ष (अगहन) माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। 2025 में, यह पावन पर्व दिसंबर माह में आएगा। भक्तों के लिए सही समय पर पूजा करना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि उन्हें भगवान दत्तात्रेय का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
तिथि: 4 दिसंबर 2025 (गुरुवार)
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 3 दिसंबर 2025 को शाम 06:45 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 4 दिसंबर 2025 को शाम 05:10 बजे
चूंकि पूर्णिमा तिथि 4 दिसंबर को सूर्योदय के समय व्याप्त रहेगी और शाम तक रहेगी, इसलिए दत्त जयंती 2025 का मुख्य उत्सव इसी दिन मनाया जाएगा। गुरुवार का दिन होने के कारण, जो कि गुरु का दिन माना जाता है, इस वर्ष की जयंती का महत्व और भी बढ़ जाता है।
भगवान दत्तात्रेय का स्वरूप अत्यंत अद्भुत और रहस्यमयी है। उनके तीन सिर और छह भुजाएं हैं। उनके तीन सिर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं, जबकि उनकी छह भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, त्रिशूल, कमंडल और जपमाला सुशोभित हैं। उनके साथ चार कुत्ते भी दिखाई देते हैं, जो चारों वेदों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उनके पीछे एक गाय होती है, जो पृथ्वी माता का प्रतीक है।
दत्त संप्रदाय में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए यह दिन दीवाली से कम नहीं होता। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात में इस पर्व की धूम देखते ही बनती है। विशेष रूप से गाणगापुर, नरसोबा वाड़ी और औदुंबर जैसे तीर्थस्थलों पर भक्तों का तांता लगा रहता है।
व्यक्तिगत अनुभव की बात करूं तो, जब मैं पहली बार महाराष्ट्र के एक दत्त मंदिर गया था, तो वहां का माहौल इतना आध्यात्मिक और शांत था कि मन के सारे विकार अपने आप शांत हो गए। 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का जाप कानों में गूंजते ही एक नई ऊर्जा का संचार होता है।
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