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read moreकेरल के त्रिशूर जिले में स्थित गुरुवायुर मंदिर न केवल दक्षिण भारत का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, बल्कि इसे 'भूललोक वैकुंठ' (पृथ्वी पर भगवान विष्णु का निवास) भी कहा जाता है। हर साल यहाँ मनाई जाने वाली 'गुरुवायुर एकादशी' का महत्व उतना ही है जितना उत्तर भारत में वैकुंठ एकादशी का। जब हम guruvayur ekadashi 2025 की बात करते हैं, तो हम केवल एक तारीख की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, आस्था और भक्ति के एक महासागर की चर्चा कर रहे होते हैं।
एक बार जब मैं केरल की यात्रा पर था, तो मुझे गुरुवायुरप्पन (भगवान कृष्ण का बाल रूप) के दर्शन का सौभाग्य मिला। वहां का वातावरण ऐसा था मानो समय थम गया हो। चंदन की खुशबू, हाथियों की चिंघाड़ और "नारायण-नारायण" का जाप—यह सब एक अलौकिक अनुभव था। 2025 में आने वाली यह एकादशी भक्तों के लिए फिर से वही दिव्य अवसर लेकर आ रही है।
भक्तों के मन में सबसे पहला प्रश्न यही होता है कि आखिर 2025 में यह पावन दिन कब आएगा? पंचांग के अनुसार, गुरुवायुर एकादशी वृश्चिकम (मलयालम कैलेंडर) महीने में आती है, जो आमतौर पर नवंबर या दिसंबर में पड़ता है।
2025 में गुरुवायुर एकादशी की संभावित तिथि: 1 दिसंबर 2025 (सोमवार)
हालांकि, तिथियां चंद्र गणना पर आधारित होती हैं और इनमें थोड़ा बदलाव संभव है, लेकिन मुख्य उत्सव इसी समय के आसपास होगा। एकादशी तिथि का प्रारंभ और समापन का सटीक समय स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा से कुछ दिन पहले मंदिर प्रशासन द्वारा घोषित किया जाता है। भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे यात्रा की योजना बनाने से पहले मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट या पंचांग से पुष्टि कर लें।
गुरुवायुर एकादशी का महत्व केवल उपवास तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक संदर्भ छिपे हैं जो इसे अद्वितीय बनाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुरुवायुर एकादशी अक्सर गीता जयंती के साथ मेल खाती है। यह वह दिन माना जाता है जब भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अर्जुन को भगवद गीता का उपदेश दिया था। इसलिए, इस दिन गुरुवायुर मंदिर में गीता का पाठ और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह ज्ञान और भक्ति का संगम है।
एक बहुत ही प्रचलित कथा आदि शंकराचार्य से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार आदि शंकराचार्य आकाश मार्ग से यात्रा कर रहे थे। जब वे गुरुवायुर मंदिर के ऊपर से गुजरे, तो उन्होंने नीचे देखने की जहमत नहीं उठाई। परिणामस्वरुप, वे नीचे गिर पड़े और उनकी शारीरिक गति रुक गई। तब उन्हें अहसास हुआ कि गुरुवायुरप्पन की शक्ति असीम है। उन्होंने वहीं एकादशी के दिन भगवान की स्तुति की और क्षमा मांगी। तब से, इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया।
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